Saturday, 14 May 2016

सर्वाधिक प्रिय पुरुष (अंतिम भाग)

चतुर्थ भाग का शेष....
इस भौतिक जगत् में जीव एक आध्यात्मिक प्राणी है, किन्तु उसमें भोग करने की अर्थात भौतिक शक्ति का शोषण करने की प्रवृति होरी है इसलिए उसे शरीर प्राप्त हुआ है| जीवो की 84,00,000 योनियाँ हैं और हर योनि का प्रथक् शरीर है|शरीर के अनुसार ही उसमे विशिष्ट इन्द्रिया होती हैं जिनसे वे किसी विशेष आनंद का भोग कर सकते हैं |मान लीजिये कि आपको एक कँटीली झाड़ी दे दी जाये और कहा जाय , "देवियो और सज्जनो! यह एक अत्युत्तम भोजन है| यह ऊंटो द्वारा प्रमाणित है|यह अति उत्तम है |" तो क्या आप इसे खाना पसंद करेंगे?"नहीं, आप यह क्या व्यर्थ की वस्तु मुझे दे रहे हैं?" आप कहेंगे, चूँकि आपको ऊँट से भिन्न शरीर मिला हुआ है अतएव आपको कँटीली झाड़िया नही भाती| किन्तु यही झाड़ी ऊँट को दे दी जाये तो वह सोचेगा कि यह तो अत्युत्तम आहार है|
यदि सुअर तथा ऊँट बिना विकट संघर्ष के इन्द्रिय तृप्ति का भोग कर सकते है तो हम मनुष्य क्यों नहीं कर सकते? हम कर सकते हैं किन्तु यह हमारी चरम उपलब्धि नहीं होगी| चाहे कोई सुअर य ऊँट अथवा मनुष्य ,इन्द्रिय तृप्ति भोगने की सुविधाएँ प्रकृति द्वारा प्रदान की जाती हैं |अतएव वे सुविधाएँ जो आपको प्रकृति के नियम द्वारा मिलनी ही हैं उनके लिए आप श्रम क्यों करें? प्रत्येक योनि में शारीरिक माँगो की तुष्टि की व्यवस्था प्रकृति द्वारा की जाती है |इस तृप्ति की व्यवस्था उसी तरह की जाती है जिस तरह दुःख की व्यवस्था की जाती रहती है|क्या आप चाहेंगे की आपको ज्वर चढ़े? नहीं| ज्वर क्यों चढ़ता है? मैं नही जानता|किन्तु यह चढ़ता ही है, है न! क्या आप इसके लिए प्रयास करते है? नहीं| तो यह चढ़ता कैसे है? प्रकृति से|यही एकमात्र उत्तर है|यदि आपका कष्ट प्रकृति द्वारा प्रदत्त है तो आपका सुख भी प्रकृतिजन्य है|इसके विषय मे चिंता न करें|यही प्रहलाद महाराज का आदेश है| यदि आपको बिना प्रयास के ही जीवन मैं कष्ट मिलते हैं,ति सुख भी बिना प्रयास के प्राप्त होगा|
तो इस मनुष्य जीवन का वास्तविक प्रयोजन क्या है? "कृष्णभावनामृत का अनुशीलन|" अन्य सारी वस्तुऍ प्रकृति के नियमो द्वारा, जो अनंततः ईश्वर का नियम है,प्राप्त हो जायेंगी |यदि मैं प्रयास न भी करूँ तो मुझे अपने विगत कर्म तथा शरीर के कारण ,जो भी मिलना है,वह प्रदान किया जायेगा| अतएव आपकी मुख्य चिंता मनुष्य जीवन के उच्चतर लक्ष्य को खोज निकालने की होनी चाहिए🌹🌹🌹🌹
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Posted by prakash chand thapliyal

Wednesday, 11 May 2016

सर्वाधिक प्रिय पुरुष (चतुर्थ भाग)

तृतीय भाग का शेष..
यह आत्मा क्या है? यह आत्मा भगवान् का अंश है| जिस तरह हम हाथ या अंगुली की रक्षा करना चाहते हैं क्योंकि वह पूरे शरीर का अंग है,उसी तरह हम अपने को बचाना चाहते हैं क्योंकि यही भगवान् की रक्षा-विधि है| भगवान् को रक्षा की आवश्यकता नही होती यह तो उनके प्रति हमारे प्रेम की अभिव्यक्ति है जो अब विकृत हो चुकी है| अँगुली तथा हाथ सारे शरीर के हितार्थ काम करने के लिए हैं | जैसे ही मैं चाहता हूँ कि मेरा हाथ यहां आये तो वह तुरंत आ जाता है और जैसे ही मैं चाहता हूँ कि अँगुली मृदंग बजाये,वह बजने लगती है| यह प्राकृतिक स्तिथि है| इसी तरह हम अपनी शक्ति को भगवान् की सेवा में लगाने के लिए उनकी खोज करते हैं किन्तु माया शक्ति के प्रभाव के कारण हम इसे जान नहीँ पाते | यही हमारी भूल है| मनुष्य जीवन में हमे यह सुयोग मिला है कि हम अपनी वास्तविक स्तिथि को समझें | चूँकि आप सभी मनुष्य हैं इसलिए आप सभी कृष्णभावनामृत सीखने यहाँ आये हैं जो कि आपके जीवन का वास्तविक लक्ष्य है|मैं कुत्ते बिल्लियों को यहाँ बैठने के लिए आमंत्रित नही कर सकता | यही अंतर है मनुष्यो और कुत्ते-बिल्लियों में| मनुष्य जीवन के वास्तविक लक्ष्य को प्राप्त करने कि आवश्यकता को समझ सकता है| किन्तु यदि वह इस सुअवसर को खो देता है ,तो इसे महान अनर्थ समझना चाहिए|
प्रह्लाद महाराज कहते हैं,"ईश्वर सर्वाधिक प्रिय व्यक्ति हैं|हमें उनकी खोज करनी चाहिए|"तब जीवन की भौतिक आवश्यकताओं के विषय में क्या होगा? प्रह्लाद महाराज उत्तर देते हैं,"तुम लोग इन्द्रिय तृप्ति के प्रति आसक्त हो किन्तु इन्द्रिय तृप्ति तो इस शरीर के संसर्ग से स्वतः ही प्राप्त हो जाती है|" चूँकि सुअर को एक विशेष प्रकार का शरीर मिला है अतएव उसकी इन्द्रिय तृप्ति मल भक्षण से होती है जो आप सब के लिए घृणित वस्तु है| मल त्याग करने के बाद आप दुर्गंध से बचने के लिए तत्काल ही स्थान त्याग कर देते है लेकिन सुअर प्रतीक्षा करता रहता है|जैसे ही आप मल त्यागेंगे ,वह तुरंत उसका आनंद उठता है| अतएव शरीर के विविध प्रकारो के अनुसार इन्द्रिय तृप्ति भिन्न भिन्न प्रकार की होती है| इन्द्रिय तृप्ति प्रत्येक देहधारी को प्राप्त होती है| ऐसा कभी मत सोचे की मल खाने वाले सुअर दुखी है|नहीं|वे मल भक्षण कर मोटे हो रहे हैं|वे अत्यंत सुखी है|
दूसरा उदाहरण ऊट का है |ऊट कटीली झाड़ियो के प्रति आसक्त होता है| क्यों? क्योंकि जब वह कटीली झाड़िया खाता है तो वो उसकी जीभ काट देती हैं| जिससे उसका रक्त चुने लगता हैं और वह अपने ही रक्त का आस्वादन करता है|तब वह सोचता है,"में आनंद प रहा हूँ|"यह इन्द्रिय तृप्ति है|यौन जीवन भी ऐसा ही है|हम अपने ही रक्त का आस्वादन करते हैं और सोचते है कि हम आनंद लूट रहे हैं|यही हमारी मूर्खता है|
जारी...
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Posted by prakash chand thapliyal

Monday, 9 May 2016

सर्वाधिक प्रिय पुरुष (तृतीय भाग)

द्वितीय भाग का शेष..

भगवतगीता में कृष्ण कहते हैं कि पुण्य कर्मो से मनुष्य सर्वोच्च भौतिक लोक अर्थात ब्रह्मलोक को प्राप्त कर सकता है जहाँ पर जीवन की अवधि करोड़ो वर्ष की है | आप वहाँ की जीवन-अवधि की गणना नही कर सकते, आपका सारा गणित का ज्ञान निष्फल हो जाता है |भगवतगीता मे कहा गया है की ब्रह्मा का जीवन इतना दीर्घ है कि हमारे  4,32,00,00,000 वर्ष उनके बारह घंटो के तुल्य हैं| कृष्ण कहते है,"तुम चींटी से लेकर ब्रह्मा तक कोई भी पद इच्छानुसार प्राप्त कर सकते हो पर वहां पर भी जन्म-मरण की पुनरावृत्ति होगी| किन्तु यदि तुम कृष्णभावनामृत का अभ्यास करके मेरे पास आते हो,तो तुम्हें इस कष्ट-प्रद भौतिक जगत् में पुनः नही आना होगा|"
प्रह्लाद महाराज यही बात कहते है,"हमें अपने सर्वाधिक प्रिय मित्र,परम भगवान् कृष्ण की खोज करनी चाहिए"वे हमारे सर्वाधिक प्रिय मित्र क्यों हैं? वे स्वाभिक रूप से प्रिय है| क्या आपने कभी विचार किया है कि आप किसे सर्वाधिक प्रिय वस्तु मानते हैं? आप स्वयं ही वह सर्वाधिक प्रिय वस्तु हैं| उदाहरणतः मैं यहाँ बैठा हूँ किन्तु यदि आग लगने की चेतावनी दी जाये ,तो मैं तुरंत अपनी रक्षा के विषय में सोचूँगा |मैं सर्वप्रथम सोचूंगा कि मैं अपने आप को किस प्रकार बचा सकता हूँ | तब हम अपने मित्रों और अपने संबंधियो तक को भूल जाते हैं और यही भाव रहता है कि सर्वप्रथम मैं अपने को बचा लूँ | आत्म-रक्षा प्रकृति का सर्वप्रथम नियम है|
स्थूल दृश्टिकोण से आत्मा, "स्वयं" शब्द का अर्थ शरीर है किन्तु सूक्ष्म अर्थ में मन य बुद्धि ही आत्मा है| और वस्तुतः आत्मा का अर्थ आत्मा ही है| स्थूल अवस्था में हम अपने शरीर की रक्षा करने तथा उसे तुष्ट करने में अत्यधिक रुचि लेते हैं किन्तु सूक्ष्मतर अवस्था में मन तथा बुद्धि को तुष्ट करने में रुचि लेते हैं|किन्तु मानसिक तथा बौद्धिक स्तर के ऊपर , जहाँ का वातावरण अध्यतमिक्रत है,हम यह समझ सकते है कि अहं ब्रहास्मि अर्थात् "मैं यह मन, बुद्धि या शरीर नही हूँ- मैं तो आत्मा हूँ - भगवान् का भीन्नाशं|" यही है वास्तविक समझ य ज्ञान का स्तर य पद|
प्रह्लाद महाराज कहते हैं कि समस्त जीवों में से विष्णु परम हितैषी हैं| इसलिए हम सभी उनकी खोज में लगे हैं| जब बालक रोता है,तो वह क्या चाहता है? अपनी माता|किन्तु इसे व्यक्त करने के लिए  उसके पास कोई भाषा नही होती| स्वभावतः उसके पास उसका शरीर है जो उसकी माता के शरीर से उत्पन्न होता है अतएव अपनी माता के शरीर से उसका घनिष्ट संबंध होता हैं| बालक अन्य किसी स्त्री को नही चाहेगा|बालक रोत है किन्तु जब वह स्त्री ,जो बालक की माँ होती है,आती है और उसे गोद में उठा लेती है तो वह बालक शांत हो जाता है| यह सब व्यक्त करने के लिए उसके पास कोई भाषा नही होती किन्तु उसकी माता से उसका संबंध प्रकृति का नियम है| इसी तरह हम स्वाभिक रूप से शरीर की रक्षा करना चाहते है|यह आत्म-संरक्षण हैं| यह जीव का प्राकृतिक नियम है और सोना भी प्राकृतिक नियम है|तो मैं शरीर की रक्षा क्यों करु? क्योकि इस शरीर के भीतर आत्मा है|
जारी...
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Posted by prakash chand thapliyal

Sunday, 8 May 2016

सर्वाधिक प्रिय पुरुष (द्वितीय भाग)

प्रथम भाग का शेष......

यद्यपि मनुष्य का स्वरूप क्षणिक है, फिर भी इस मनुष्य रूप मे आप जीवन की सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त कर सकते हैं|वह सिद्धि क्या है? सर्वव्यापक भगवान को जान लेना| अन्य योनियों में यह संभव नही है |चूँकि हम क्रमिक विकास द्वारा यह मनुध्य रूप प्राप्त करते है इसलिए यह दुर्लभ अवसर है | प्रकृति के नियमानुसार आपको अनन्तः मनुष्य शरीर दिया जाता है जिससे आप आध्यात्मिक जीवन को प्राप्त करके भगवद्धाम वापस ज सकें|
जीवन का चरम लक्ष्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु या कृष्ण हैं | बाद मैं एक श्लोक में प्रह्लाद महाराज कहते हैं, "इस भौतिक जगत् के जो लोग भौतिक शक्ति द्वारा मोहित हो जाते है,वे यह नही जानते की मनुष्य-जीवन का लक्ष्य क्या है? क्यों? क्योकि वे भगवान् की चकाचोंध करने वाली बहिरंगा शक्ति द्वारा मोहित हो चुके हैं| वे भूल चुके हैं कि जीवन तो सिद्धि के चरम लक्ष्य भगवान् विष्णु को समझने के लिए एक सुअवसर है|" विष्णु या ईश्वर को समझने के लिए हमें क्यों अतीव उत्सुक होना चाहिए? प्रह्लाद महाराज कारण समझाते है,"विष्णु सर्वाधिक प्रिय व्यक्ति हैं|हम यह भूल चुके हैं|" हम सब किसी प्रिय मित्र की खोज मैं रहते है- हर व्यक्ति इस प्रकार की खोज करता है|"पुरुष स्त्री के साथ प्रिय मैत्री करना चाहता है और स्त्री पुरुष के साथ मैत्री करना चाहती है| या फिर एक पुरुष अन्य पुरुष को खोजता है और एक स्त्री अन्य स्त्री को खोजती है| हर व्यक्ति किसी न किसी प्रिय,मधुर मित्र की तलाश मे रहता है | ऐसा क्यों? क्योकि हम ऐसे प्रिय मित्र का सहयोग चाहते हैं जो हमारी सहायता कर सके | यह जीवन संघर्ष का अंग है और यह स्वाभाविक है| किन्तु हम यह नही जानते कि हमारे सर्वाधिक प्रिय  मित्र पूर्ण पुरषोतम भगवान् विष्णु हैं|
जिन्होंने भगवदगीता का अध्ययन किया है,उन्हें पांचवे अध्याय में यह उत्तम श्लोक मिला होगा ,"यदि आप शांति चाहते हैं,तो आपको स्पष्ट रूप से यह समझना होगा कि इस लोक की तथा अन्य लोको की हर वस्तु कृष्ण संपत्ति है,वे ही हर वस्तु के भोक्ता हैं एवं वे ही हर एक के परम मित्र हैं| तो फिर तपस्या क्यों की जाये ? ये सारे कार्य भगवान् को प्रसन्न करने के अतिरिक्त और किसी निमिन्त नही है | और जब भगवान् प्रसन्न होते हैं तो आपको फल मिलता है| आप चाहे उच्चतर भौतिक सुख की कामना करते हो य आध्यात्मिक सुख की; आप चाहे इस लोक  में श्रेष्ठतर जीवन बिताना चाहते हों या अन्य लोको में -यदि आप भगवान् को प्रसन्न कर लेते हैं तो आप उनसे मनवांछित फल प्राप्त कर सकेंगे | इसलिए वे अत्यंत निष्ठावान मित्र हैं| किन्तु बुद्धिमान व्यक्ति ऐसी कोई वस्तु नही चाहता जो भौतिक रूप से कुलषित हो|
जारी...........
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Tuesday, 3 May 2016

सर्वाधिक प्रिय पुरुष (प्रथम भाग)

आज मैं आपलोगों को एक बालक भक्त की कथा सुनाऊँगा जिनका नाम प्रह्लाद महाराज था! वे घोर नास्तिक परिवार मे जन्मे थे!
इस संसार मे दो प्रकार के मनुष्य है - असुर तथा देवता!उनमे अंतर क्या है? मुख्य अंतर यह है कि देवतागण भगवान के प्रति अनुरक्त रहते है जबकि असुरगण नास्तिक होते है ! वे ईश्वर मे इसलिये विश्वास नही करते, क्योंकि वे भौतिकवादी होते हैं ! मनुष्यो की ये दोनो श्रेणियां इस संसार मे सदैव विद्यमान रहती हैं |
कलियुग (कलह का युग) होने से सम्प्रति असुरो की संख्या बढ़ी हुई है किन्तु यह वर्गीकरण  सृष्टी के प्राराम्भ से चला आ रहा है। आपलोगो से मैं जिस घटना का वर्णन करने ज रहा हूँ वह सृष्टी के कुछ लाख वर्षो बाद घटी ।

प्रहलाद महाराज सर्वाधिक नास्तिक एवं भौतिक रूप से सर्वाधिक  शक्तिशाली व्यक्ति के पुत्र थे । चूँकि उस समय का समाज भौतिकवादी था अतैव इस बालक का भगवान के यशोगान का अवसर ही नही मिलता था । महात्मा का लक्षण् यह होता है की भगवान की महिमा का प्रसार करने के लिए अत्यधिक उत्सुक रहता था ।

जब प्रह्लाद महाराज पाँच वर्ष के बालक थे ,  तो उन्हें पाठशाला भेजा  गया  । जैसे ही मनोरंजन का अंतराल आता और शिक्षक बाहर चला जाता वे अपने मित्रो से कहते मित्रो!आओ। हम कृष्णभावनामृत  के विषय  मे चर्चा करे ।"

यह दृश्य श्रीमदभगवतं क्व सप्तम स्कंध के छठे अध्याय मे वर्णित है ।भक्त प्रह्लाद कहते है , "मित्रो !
यह बाल्यावस्था ही कृषण्भावनामृत अनुशीलन करने का उचित समय है  ।"और उनके बालमित्र उत्तर देते है ,
" ओह ! हम तो खेलेंगे | हम कृष्ण -भावनामृत क्यों ग्रहण करे?" प्रतिउत्तर मे प्रह्लाद महाराज कहते है, "यदि तुम लोग बुद्धिमान हो, तो बाल्यावस्था से ही भागवत धर्म प्रारम्भ करो |"

श्रीमदभगवतं भागवत-धर्म प्रस्तुत करता है अर्थात यह ईश्वर विषयक वैज्ञानिक ज्ञान तक ले जाता है | भागवत का अर्थ है, "पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्" और धर्म का अर्थ है, "विधि-विधान |" यह मानव जीवन अति दुर्लभ है | यह एक महान सुयोग है | इसलिए प्रह्लाद कहते हैं "मित्रो ! तुम लोग सभ्य मनुष्यों के रूप मे उत्पन्न हुए हो, अतः तुम्हारा ये मनुष्य शरीर क्षणभंगुर होते हुए भी महानतम सुयोग है |" कोई भी व्यक्ति अपनी जीवन अवधि नही जानता | ऐसी गणना की जाती है कि इस युग मे मनुष्य-शरीर पाँच सौ वर्षो तक जीवित रह सकता है | किन्तु जैसे जैसे कलयुग आगे बढ़ता जाता है, जीवन की अवधि,स्मृति,दया,धार्मिकता तथा अन्य ऐसी ही विभूतियाँ घटती जाती है | अतएव इस युग मे दीर्घायु अनिश्चित है |
जारी...............
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Tuesday, 26 April 2016

BHARTIYA SANSKRITI (भारतीय संस्कृति) by prakash chand thapliyal

भारतीय संस्कृति

कभी कभी मेरे अंग्रेज और अन्य अभारतीय मित्र मेरे से कई तरह के सवाल पूछते है, जैसे हमारी संस्कृति कैसी है, हमारे इतने सारे देवी देवता क्यों है, अगर हम सभी एक जैसे है तो हमारे यहाँ विभिन्न प्रकार की जातिया प्रजातिया क्यों है? वर्ण सिस्टम का क्या महत्व है? और हमारे हर त्योहारों के साथ कोई ना कोई कथा क्यो जुड़ी हुई है? भारत मे इतनी भाषाओ के बावजूद कौन सी चीज लोगो को जोड़े रखती है? जब आप लोग अपने को एक मानते हो तो फिर दंगे फसाद क्यो होते है, आपके धर्म और संस्कृति मे इतने विरोधाभास क्यों है? वगैरहा वगैरहा….. मैने उन्हे समझाने की कुछ कोशिश की है, आइये आप भी देखिये कि मै इसमे कितना सफल हो सका हूँ.

किसी भी देश का अपना इतिहास होता है, परम्परा होती है. यदि हम देश को शरीर माने तो, संस्कृति उसकी आत्मा होती है, या शरीर मे दौड़ने वाला रक्त होता है या फिर सांस…..जो शरीर को चलाने के लिये अतिआवश्यक है. किसी भी संस्कृति में अनेक आदर्श रहते हैं, आदर्श मूल्य है, और मूल्यों का मुख्य संवाहक संस्कृति होती है. भारतीय संस्कृति में मुख्य रूप से चार मूल्यों की प्रधानता दी गयी है – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष लेकिन कोई भी व्यक्ति इन चारों पुरुषार्थों अथवा मूल्यो को एक ही काल में एक ही साथ चरितार्थ नहीं कर सकता है, क्योंकि व्यक्ति का जीवन सीमित होता है, इसलिए हिन्दू धर्म में वर्णाश्रम व्यवस्था एवं पुनर्जन्म पर बल दिया गया है. वर्णाश्रम व्यवस्था को यदि गुण और कर्म पर आधारित माने तो यह व्यवस्था आज भी अत्यन्त वैज्ञानिक एवं उपादेय प्रतीत होती है. अगर देखा जाय तो यह वर्णाश्रम धर्म ही है इसकी बदौलत ऊँचे से ऊँचे ब्राह्मण पैदा हुए, ब्राह्मणों ने तो अपने लिए धर्म का काम लिया दान देना लेना, विद्या पढ़ना पढ़ाना, क्षत्रियों का कर्तव्य था कि जहाँ जरूरत पड़े वहाँ जान दे लेकिन मान को न जाने दें. वैश्य का कर्तव्य था कि वेद – वेदांग पढ़े और व्यापार करता रहे और शुद्रो को कर्तव्य था कि अन्य सभी कामो को अन्जाम देना. जब शुद्रों को वेद पढ़ने का अधिकार नहीं था तब वेदव्यासजी ने चारों वेदों का अर्थ महाभारत में भर दिया ताकि सब प्राणी लाभ उठा सकें. 

यह हिन्दू संस्कृति की समानता का एक प्रतीक है.
भारत पर विदेशियो ने अनेक बार आक्रमण किया और हिन्दु संस्कृति को नष्ट करने की कोशिश की,लेकिन वो संस्कृति ही क्या जो मिट जाये, भारत आये अनेक आक्रमणकारियो ने भी माना कि इस देश की संस्कृति को नष्ट करना नामुमकिन है, बल्कि उनमे से कई लोग अपने साथ विभिन्न प्रकार के धर्म और सम्प्रदाय ले आये, और कई यहीं पर बस गये, जिससे गंगा जमुनी संस्कृति का जन्म हुआ,जिसे भारतीय संस्कृति ने बड़ी ही सहनशीलता के साथ स्वीकारा और गले लगाया. विभिन्न वेद शास्त्र हमारी संस्कृति का हिस्सा है, इसके अतिरिक्त भारत की अन्य परम्परायें जैसे अतिथि देवो भवः, सामाजिक आचार व्यवहार,शरणागत रक्षा,सर्वधर्म समभाव,वसुधैव कुटुम्बकम,अनेकता मे एकता जैसी प्रमुख है.
prakash chand thapliyal with a bhagwa flag.

पुराने जमाने से ही हमे समझाया गया है कि घर आया अतिथि भगवान के समान है, हम खुद भले ही भूखे रह जाये,लेकिन अतिथि का पेट भरना जरूरी है.इसी तरह से हमे समाज मे कैसा व्यवहार एवं आचरण करना चाहिये,इसकी शिक्षा हमारी संस्कृति हमे देती है, विभिन्न कहानियो एव लोकोत्तियो के द्वारा, हमे बड़ो की इज्जत करनी चाहिये और छोटो के प्रति स्नेह का आचरण करना चाहिये, एवम महिलाओ और बुजुर्गो के प्रति विशेष सम्मान दिखाना चाहिये.इसके अतिरिक्त शरण मे आये व्यक्ति की रक्षा करना हमारा परम धर्म है.

भारत ही केवल एक ऐसा देश है जहाँ सर्वधर्म समभाव का पूरा पूरा ध्यान रखा गया है, जितनी इज्जत हम अपने धर्म की करते है, उतनी ही इज्जत हमे दूसरो के धर्म की करनी चाहिये.यहाँ सुबह सुबह मंदिर से मन्त्रोचार की ध्वनि,मस्जिद से अजान,गुरूद्वारे से शबद कीर्तन की आवाज और चर्च से प्रार्थना की पुकार एक साथ सुनी जा सकती है.जितनी भाषाये यहाँ बोली जाती है, विश्व मे कहीं और नही बोली जाती.बोल-चाल,खान-पान,रहन-सहन मे अनेकता होते हुए भी हम एक साथ रहते है, एक दूसरे के तीज त्योहार मे शिरकत करते है, होली,दीवाली,ईद,बाराबफात, मुहर्रम,गुरपर्ब और क्रिसमस साथ साथ मनायी जाती है. मजारो ‌और मकबरो पर हिन्दूओ द्वारा चादर चढाना, और दूसरे सम्प्रदाय के लोगो का मंदिरो और गुरद्वारो पर दर्शन करना,मत्था टेकना बहुत आम बात है. यह हमारे धर्म और लोकाचार की सहनशीलता का जीता जागता उदाहरण है.

रही बात हमारे विभिन्न प्रकार के देवी देवता होने की…तो हिन्दू धर्म मे प्रकृति को हर तरह से पूजा गया है, चाहे वह वायू,जल,पृथ्वी, अग्नि या आकाश हो. इस प्रकार से हम प्रकृति के हर रूप की पूजा करते है, चाहे वह पहाड़ हो या कोई जीव जन्तु या हमारी वन्य सम्प्रदा, हमारी संस्कृति मे इन सबको विशेष स्थान दिया गया है.दुनिया मे ऐसी कोई संस्कृति नही होगी जहाँ प्रकृति को विभिन्न रूपो और स्वरूपो में पूजा गया है, रही बात त्योहारो से जुड़ी कहानियो की तो, सामान्य जनता जो उपनिषदो और वेदो की लिखी गूढ बातो को नही समझ सकती, उनके लोक आचरण के लिये विभिन्न ऋषि मुनियो ने अनेक गाथाये लिखी और उनको विभिन्न त्योहारो से इस तरह से जोड़ा कि सामान्य जन भी उसके साथ जुड़ सके और उसे अपना सके साथ ही ईश्वर का ध्यान और मनन कर सके.

इसके अतिरिक्त और भी चीजे हमारी संस्कृति मे जुड़ती रही, सारो का उल्लेख करना तो सम्भव नही हो सकेगा.. प्रमुख रूप से क्रिकेट की संस्कृति है, यह खेल अब हमारी संस्कृति मे शामिल हो गया है, क्रिकेटरो के अच्छे बुरे प्रदर्शन पर हमे हंसते रोते है, इनको अपने बच्चो से भी ज्यादा प्यार करते है, भगवान जैसी पूजा करते है, जब जीतते है तो तालिया बचाते है, जब हारते है तो गालिया देते है.

अब समस्या यहाँ आती है कि हम अपनी संस्कृति का कितना मान रख पाते है, वेद शास्त्र आपको रास्ता दिखा सकते है, लेकिन आपको उनपर चलने के लिये बाध्य नही कर सकते….एक और बात चूंकि ये सारे शास्त्र गूढ भाषा मे लिखे गये थे, इसलिये समय समय पर अनेक स्वार्थी धर्माचार्यो ने अपने और कुछ राजनीतिज्ञो के निहित स्वार्थो के लिये, इन शास्त्रो का मनमाने ढंग से विवेचना की और अपने फायदे के लिये इस्तेमाल किया. और अपनी दुकाने चलायी …भाई को भाई से लड़ाया और विभिन्न समुदायो मे आपस मे बैर और नफरत फैलायी……और जो आज तक जारी है.इन्ही लोगो की वजह से हमारे यहाँ कभी कभी दंगे फसाद होते है, लेकिन आपसी भाईचारा कभी खत्म नही होता.

मार्क ट्वेन ने १८५६ मे जब भारत का दौरा किया था तो उसने लिखा था, भारत सांस्कृतिक रूप से परिपूर्ण राष्ट्र है. वैसे भी समय समय पर कई विदेशी विद्वानो ने भारत का दौरा किया और यहाँ की संस्कृति को दूनिया मे सबसे उन्नत माना.यही हमारी संस्कृति है, और हम सभी भारतीयो को इस पर गर्व है.

Friday, 8 April 2016

Brahm gyan ( ब्रह्म ज्ञान ) by prakash chand thapliyal

Brahm gyan (ब्रह्म ज्ञान)

"A lot has been said and written by spiritual gurus and religiously inclined persons on how to attain the ultimate goal of self-realisation and holistic well-being. Despite advancement, both technological and economic, we are still groping to achieve peace, tranquility, universal brotherhood and tolerance.

प्रकृति और पुरुष का मिलन ही ब्रहमसत्य है
Description of brahm satya by prakash chand thapliyal








1. परमसत्य का ज्ञान ही ब्रह्म ज्ञान है!

2. आत्मा और परमात्मा का मिलन ही ब्रह्मज्ञान है!

3. पंचतत्व का ज्ञान (तत्वज्ञान) का बोध ही ब्रह्म ज्ञान है!

4. योग के आठो चरण (यम, नियम, आसन ,प्राणयाम,प्रत्याहार,धारणा,ध्यान,समाधि) की चरम सीमा ही ब्रह्मज्ञान है!

5. जीवन और मृत्यु से विरक्त होना ही ब्रह्मज्ञान है!

6.प्रकृति और पुरुष का मिलन ही ब्रह्मज्ञान है!

When a seeker of truth receives brahm gyan, he or she instantly experience divine light within. Divine knowledge comprises instant and immediate practical experience of divine light, the holy name, inner music and holy nectar. God has been described as the divine light by holy scriptures like the Vedas, Shastras, the Upanishads and the puranas. As there is fire hidden in wood and it can be produced only through a technique, there is divine light hidden in every particle. A perfect master can show us that divine light within us. Our scriptures profusely emphasise that our bhakti starts only after we see and experience that divine light within us. The simran or smaran or remembrance of that eternal name which is already present in our inner-self can be done with neither tongue not with the lips. That holy name is inexpressible and hence beyond any language. The simran of this holy name makes us pure, take us on the path of true bhakti and salvation. Divine music or the anhad vani echoes in our inner-self and awakens feelings of forgiveness, morality, satisfaction, compassion and truth within us and through constant practice, we attain eternal peace and pleasure. Amrit or holy nectar is present in plenty in the human body. Amrit keeps the child alive in the womb of his mother. On taking birth, the child cries as he gets detached from God.

The role of the perfect master is to link us with the inner world which has been forgotten by us. Attainment of supreme knowledge is the right of every human being, whosoever he or she may be. It is only after we see divine light within our inner-self that self-transformation and holistic well-being shall become reality."

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Posted  by prakash chand thapliyal

Monday, 21 March 2016

KAMAKHYA MYSTERY UNLOCKED ( कामाख्या का रहस्य ) BY PRAKASH CHAND THAPLIYAL

नाम: कामाख्या मंदिर, गुवाहाटी


निर्माता: चिलाराय
निर्माण काल :
देवता: कामाख्या देवी
वास्तुकला:
स्थान: नीलांचल पर्वत, निकट गुवाहाटी, असम


कामाख्या मंदिर असम की राजधानी दिसपुर के पास गुवाहाटी से ८ किलोमीटर दूर कामाख्या मे है। कामाख्या से भी १० किलोमीटर दूर नीलाचल पव॑त पर स्थित हॅ। यह मंदिर शक्ति की देवी सती का मंदिर है। यह मंदिर एक पहाड़ी पर बना है व इसका महत् तांत्रिक महत्व है। प्राचीन काल से सतयुगीन तीर्थ कामाख्या वर्तमान में तंत्र सिद्धि का सर्वोच्च स्थल है। पूर्वोत्तर के मुख्य द्वार कहे जाने वाले असम राज्य की राजधानी दिसपुर से 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित नीलांचल अथवा नीलशैल पर्वतमालाओं पर स्थित मां भगवती कामाख्या का सिद्ध शक्तिपीठ सती के इक्यावन शक्तिपीठों में सर्वोच्च स्थान रखता है। यहीं भगवती की महामुद्रा (योनि-कुण्ड) स्थित है।


तंत्र-मंत्र साधना के लिए विख्यात कामरूप कामाख्या (गुवाहाटी) में शक्ति की देवी कामाख्या के मंदिर में प्रतिवर्ष होने वाले 'अंबुवासी' मेले को कामरूप का कुंभ माना जा सकता है। इसमें भाग लेने के लिए देशभर के साधुओं और तांत्रिकों का जुटना आरंभ हो गया है।


वैसे तो इस वर्ष अंबुवासी मेला 22 से 25 जून तक चलेगा, लेकिन एक सप्ताह पहले से ही तांत्रिकों और साधु-संन्यासियों व साधकों का आगमन आरंभ हो गया है। शक्ति के ये साधक नीलाचल पहाड़ (जिस पर माँ कामाख्या का मंदिर स्थित है) की विभिन्न गुफाओं में बैठकर साधना करते हैं। अंबुवासी मेले के दौरान अजीबो-गरीब हठयोगी पहुँचते हैं।

कोई अपनी दस-बारह फुट लंबी जटाओं के कारण कौतूहल का कारण बना रहता है, कोई पानी में बैठकर साधना करता है तो कोई एक पैर पर खड़े होकर। इन चार दिनों में चार से पाँच लाख श्रद्धालु वहाँ पहुँचते हैं। इतना बड़ा धार्मिक जमावड़ा पूर्वोत्तर में और कहीं नहीं लगता है।

ऐसी मान्यता है कि 'अंबुवासी मेले' के दौरान माँ कामाख्या रजस्वला होती हैं। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार सौर आषाढ़ माह के मृगशिरा नक्षत्र के तृतीय चरण बीत जाने पर चतुर्थ चरण में आद्रा पाद के मध्य में पृथ्वी ऋतुवती होती है। यह मान्यता है कि भगवान विष्णु के चक्र से खंड-खंड हुई सती की योनि नीलाचल पहाड़ पर गिरी थी।

इक्यावन शक्तिपीठों में कामाख्या महापीठ को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इसलिए कामाख्या मंदिर में माँ की योनि की पूजा होती है। यही वजह है कि कामाख्या मंदिर के गर्भगृह के फोटो लेने पर पाबंदी है इसलिए तीन दिनों तक मंदिर में प्रवेश करने की मनाही होती है। चौथे दिन मंदिर का पट खुलता है और विशेष पूजा के बाद भक्तों को दर्शन का मौका मिलता है।

वैसे भी कामाख्या मंदिर अपनी भौगोलिक विशेषताओं के कारण बेहतर पर्यटन स्थल है और सालभर लोगों का आना-जाना लगा रहता है। यह पहाड़ ब्रह्मपुत्र नदी से बिलकुल सटा है। कामाख्या देवत्तर बोर्ड के प्रशासनिक अधिकारी ऋजु शर्मा के अनुसार, इतने सारे लोगों के आने से व्यवस्था संभालनी कठिन हो जाती है। जिला प्रशासन की मदद ली जाती है। उस दौरान निजी वाहनों के प्रवेश पर रोक लगा दी जाती है।


मेले को असम की कृषि व्यवस्था से भी जोड़कर देखा जाता है। किसान पृथ्वी के ऋतुवती होने के बाद ही धान की खेती आरंभ करते हैं।

पुराणों के अनुसार पिता दक्ष के यज्ञ में पति शिव का अपमान होने के कारण सती हवनकुंड में ही कूद पड़ी थीं जिसके शरीर को शिव कंधे पर दीर्घकाल तक डाले फिरते रहे। सती के अंग जहाँ-जहाँ गिरे वहाँ-वहाँ शक्तिपीठ बन गए जो शाक्त तथा शैव भक्तों के परम तीर्थ हुए। इन्हीं पीठों में से एक—कामरूप असम में स्थापित हुआ, जो आज की गौहाटी के सामने 'कामाख्या' नामक पहाड़ी पर स्थित है।

पश्चिमी भारत में जो कामारूप की नारी शक्ति के अनेक अलौकिक चमत्कारों की बात लोकसाहित्य में कही गई है, उसका आधार इस कामाक्षी का महत्व ही है। 'कामरूप' का अर्थ ही है 'इच्छानुसार रूप धारण कर लेना' और विश्वास है कि असम की नारियाँ चाहे जिसको अपनी इच्छा के अनुकूल रूप में बदल देती थीं।
असम के पूर्वी भाग में अत्यंत प्राचीन काल से नारी की शक्ति की अर्चना हुई है। 

महाभारत में उस दिशा के स्त्रीराज्य का उल्लेख हुआ है। इसमें संदेह नहीं कि मातृसत्तात्मक परंपरा का कोई न कोई रूप वहाँ था जो वहाँ की नागा आदि जातियों में आज भी बना है। ऐसे वातावरण में देवी का महत्व चिरस्थायी होना स्वाभाविक ही था और जब उसे शिव की पत्नी मान लिया गया तब शक्ति संप्रदाय को सहज ही शैव शक्ति की पृष्ठभूमि और मर्यादा प्राप्त हो गई। फिर जब वज्रयानी प्रज्ञापारमिता और शक्ति एक कर दी गईं तब तो शक्ति गौरव का और भी प्रसार हो गया। उस शक्ति विश्वास का केंद्र गोहाटी की कामाख्या पहाड़ी का यह कामाक्षी पीठ है।
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Saturday, 19 March 2016

SHREE RAM STUTI WITH MEANING ( श्री राम स्तुति ) BY PRAKASH CHAND THAPLIYAL


श्रीरामचंद्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणं ।
नवकंज लोचन, कंजमुख कर, कंज पद कंजारुणं ॥१॥
व्याख्या- हे मन! कृपालु श्रीरामचंद्रजी का भजन कर. वे संसार के जन्म-मरण रूप दारुण भय को दूर करने वाले है. उनके नेत्र नव-विकसित कमल के समान है. मुख-हाथ और चरण भी लालकमल के सदृश हैं ॥१॥


कंदर्प अगणित अमित छवि नव नील नीरद सुन्दरम ।
पट पीत मानहु तडित रूचि-शुची नौमी, जनक सुतावरं ॥२॥
व्याख्या-उनके सौंदर्य की छ्टा अगणित कामदेवो से बढ्कर है. उनके शरीर का नवीन नील-सजल मेघ के जैसा सुंदर वर्ण है. पीताम्बर मेघरूप शरीर मे मानो बिजली के समान चमक रहा है. ऐसे पावनरूप जानकीपति श्रीरामजी को मै नमस्कार करता हू ॥२॥


भजु दीनबंधु दिनेश दानव दैत्य वंश निकन्दनं ।
 रघुनंद आनंद कंद कोशल चन्द्र दशरथ नंदनम ॥३॥
व्याख्या-हे मन! दीनो के बंधू, सुर्य के समान तेजस्वी , दानव और दैत्यो के वंश का समूल नाश करने वाले,आनन्दकंद, कोशल-देशरूपी आकाश मे निर्मल चंद्र्मा के समान, दशरथनंदन श्रीराम का भजन कर ॥३॥


सिर मुकुट कुंडल तिलक चारू उदारु अंग विभुषणं ।
 आजानुभुज शर चाप-धर, संग्राम-जित-खर दूषणं ॥४॥
व्याख्या- जिनके मस्तक पर रत्नजडित मुकुट, कानो मे कुण्डल, भाल पर तिलक और प्रत्येक अंग मे सुंदर आभूषण सुशोभित हो रहे है. जिनकी भुजाए घुटनो तक लम्बी है. जो धनुष-बाण लिये हुए है. जिन्होने संग्राम मे खर-दूषण को जीत लिया है ॥४॥


इति वदति तुलसीदास, शंकर शेष मुनि-मन-रंजनं ।
मम ह्रदय कंज निवास कुरु, कामादि खल-दल-गंजनं ॥५॥
व्याख्या- जो शिव, शेष और मुनियो के मन को प्रसन्न करने वाले और काम,क्रोध,लोभादि शत्रुओ का नाश करने वाले है. तुलसीदास प्रार्थना करते है कि वे श्रीरघुनाथजी मेरे ह्रदय कमल मे सदा निवास करे ॥५॥


मनु जाहि राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर सावरो |
करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो ॥६॥
व्याख्या-जिसमे तुम्हारा मन अनुरक्त हो गया है, वही स्वभाव से ही सुंदर सावला वर (श्रीरामचंद्रजी) तुमको मिलेगा. वह दया का खजाना और सुजान (सर्वग्य) है. तुम्हारे शील और स्नेह को जानता है ॥६॥


एही भांति गौरी असीस सुनी सिय सहित हिय हरषीं अली ।
तुलसी भावानिः पूजी पुनि-पुनि मुदित मन मंदिर चली ॥७॥
व्याख्या- इस प्रकार श्रीगौरीजी का आशीर्वाद सुनकर जानकीजी समेत सभी सखिया ह्रदय मे हर्सित हुई. तुलसीदासजी कहते है-भवानीजी को बार-बार पूजकर सीताजी प्रसन्न मन से राजमहल को लौट चली ॥७॥


जानी गौरी अनुकूल, सिय हिय हरषु न जाइ कहि ।
मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे ॥८॥
व्याख्या-गौरीजी को अनुकूल जानकर सीताजी के ह्रदय मे जो हरष हुआ वह कहा नही जा सकता. सुंदर मंगलो के मूल उनके बाये अंग फडकने लगे ॥८॥
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SOCIETY CONDITION ( BY PRAKASH CHAND THAPLIYAL )

जहां तक नज़र डालता हूँ, सभी व्यापारी नज़र आते है
किसी ने पूछा अरे भाई क्या ढूंढ रहे हो !
मैंने कहा एक सच्चा देशभक्त ढूंढ रहा हूँ ,
जिसका मान ईमान और स्वाभिमान बिका ना हो .......
████████████████████████
दिल बिक गया , धडकन बिक गयी ,
बेचने वालो ने तो हवा और पानी भी डिब्बों मे पैक कर के बेच दिए!
आँखे बिक गयी , रोशनी भी बिक गयी ,
व्यापारियो ने तो इंसान की कीमत भी आकी है...
सब कुछ तो बिक गया, इंसानियत बिकना बाकी है!!
████████████████████████
समाज बिक गया , संत बिक गए,
बेचने वालो ने तो मजहब के नाम पर फिल्में भी बेच डाली!
मंदिर बिक गए , तीर्थ बिक गए,
व्यापारियो ने तो धर्म की कीमत भी आकी है...
सब कुछ तो बिक गया , भगवान बिकना बाकी है!!
████████████████████████
गाँव बिक गए , शहर बिक गए,
बेचने वाले तो कोयला भी बेच कर खा गए!
राज्य बिक गया , सीमाएं बिक गयी,
व्यापारियो ने तो देश की कीमत भी आकी है...
सब कुछ तो बिक गया , देशभक्ति बिकना बाकी है!!

अगर कुछ कर गुजरने की ललक है तुम्हारे सीने मे,
क्या मजा है , इस कदर अपने लिए यू जीने मे!
होंगे कुछ लोग जिन्होंने जीने के लिए मारना सीखा होगा ,
हमने तो बचपन से ही मरने के लिए जीना सीखा!
नाम तुम्हारा न केवल परिवार मे सिमटा हो,
वीरता तो उसमे है , कफन जिसका तिरंगे मे लिपटा हो!!

छोटी सी गुजारिश है, इतनी सी खबर कर दो,
एक बार जो लिख दू तो , मेरा लेख अमर कर दो!
घर घर तक मैं पहुँचू , उद्देश्य सफल कर दो,
फिर से निवेदन है , थोड़ी सी खबर कर दो!
साँसे कभी थम जाये दिलो मे अमर कर दो .....
आप सभी देशभक्तो से निवेदन है ज्यादा से ज्यादा संख्या मे हमसे जुड़े ............
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Tuesday, 15 March 2016

A patriotic poem (by prakash chand thapliyal)

ऐ जिंदगी ,

मुझे मेरे इस निष्क्रिय जीवन की सजा दे !
मुझे मेरी मौत से मिला दे !!

अपनी कद काठी का गुरूर, था मेरे मन मे छाया !
जो देश के काम न आ सकी, किस काम की थी वो काया !!

हंसता रहा मजबूर पर ,दिया न कभी किसी को सहारा !
सारी दुनिया से जीत गया ,पर खुद से था मैं हारा !!

दौलत के दम पर खरीदा था प्यार, जब उबल रही थी जवानी !
माँ बाप के संस्कारो की,मै देता गया कुर्बानी !!

प्यार तो वो था ही नही,नोटों की थी वो माया!
धन खत्म जब हो गया,एक पल भी नही टिक पाया!!

आगे रास्ता खत्म था ,पीछे छूट गयी थी एक संकरी गली!
कोई साथ न खड़ा था मेरे,सिर्फ थे बजरंग बली!!

पाकर आशीष उनका ,धयान पवनसुत की भक्ति मे लगा दिया!
शेष बचा सरा जीवन,मात् पित् और देशभक्ति मे लगा दिया!!

समर्पित है ये जीवन देशभक्ति मे,लेना तुम दुनिया वालो देख!
करूँगा जब मै अपने रक्त से,तिरंगे का अभिषेक!!

अगर कुछ कर गुजरने की ललक, है तुम्हारे सीने मे!
क्या मजा है इस कदर,अपने लिए यू जीने मे!!

नाम न तुम्हारा केवल, परिवार मे ही सिमटा हो!
वीरता तो उसमे है, कफन जिसका तिरंगे मे लिपटा हो!!

देना मेरे देश की शरहद पे , रेखा एक तुम खींच !
खून से अपने मै,दूँगा उस शरहद को सींच !!

अगर कभी देश की सेवा ,करते हुए मै मर भी जाउ!
प्राण न्यौछावर कर देश पे,गर्व से मैं भी शहीद कहलाऊँ!!

अगर मौत मिले किसी मोड़ पर तो एक ही गुजारिश करु.........
ऐ मौत,
मुझे मेरी जिंदगी से मिला दे!
अपने देश की सेवा करने का ,एक मौका और दिला दे!!

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Message on behalf of terrorism by prakash chand thapliyal

कौन कहता है कि आतंकवाद का कोई धर्म नही होता......

वाह रे खुदा,तेरी इस जेहादी खुदाई को मेरा सलाम !
आतंकवाद के धर्म ,इस्लाम को मेरा सलाम !!

तेरी जन्नत की राह पे चलता हुआ,वो अपना सब कुर्बान कर गया !
किस मिट्टी का बना था वो दिल,जो मासूमो पे गोली चलाते वक्त भी अल्लाह हुअकबर कह गया !!

वाह रे खुदा के नेक बंदे...
मजहब के नाम पे जो तुमने नरसंहार किया,उस समय प्रकृति भी हुई थी दंडित !
सब कुछ जो सह गया ,उसका नाम था कश्मीरी पंडित !!

मदरसो मे कुरान की आयाते पढ़ाकर ,यही सीख उन्हें सिखलाई थी !
मजहब पूछकर फिर उन्होंनो ,मासूमो पे गोलिया चलाई थी !!

जो बीत गया वो याद है, दुःख से भरी वो कहानी है !
आज जो हिन्दू चुप रहा,उसकी रगो मे पानी है !!

आओ सारे हिन्दुओ मिलकर एक हो जाओ, अब केसरिया परचम लहराना है !
हर शिला पे राष्ट्र की,राम नाम लिखवाना है !!

मैं सारे रामभक्त हिन्दू भाइयो और बहनो का आवाहन करता हूँ आओ मिलकर एक हो जाओ......

जब परिवार पे कोई आँच आती है तो सारे घरवाले मिलकर मुसीबत का सामना करते है!
ठीक उसी प्रकार आज देश पे आतंकवाद का साया है आओ मिलकर इसे देश से बाहर उखाड़ फेके.....
आतंकवाद का सिर्फ एक ही हल ....
हिन्दुराष्ट्र
हिन्दुराष्ट्र 
हिन्दुराष्ट्र
जय श्री राम ....
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Posted by prakash chand thapliyal

Saturday, 12 March 2016

Shiv tandav stotram (शिव तांडव स्तोत्रम्) by prakash chand thapliyal

शिव तांडव स्तोत्रम्

||श्रीगणेशाय नमः ||

जटा टवी गलज्जल प्रवाह पावितस्थले, गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्ग तुङ्ग मालिकाम् |
डमड्डमड्डमड्डमन्निनाद वड्डमर्वयं, चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ||१||

जटा कटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिम्प निर्झरी, विलो लवी चिवल्लरी विराजमान मूर्धनि |
धगद् धगद् धगज्ज्वलल् ललाट पट्ट पावके किशोर चन्द्र शेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ||२||

धरा धरेन्द्र नंदिनी विलास बन्धु बन्धुरस् फुरद् दिगन्त सन्तति प्रमोद मानमानसे |
कृपा कटाक्ष धोरणी निरुद्ध दुर्धरापदि क्वचिद् दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ||३||

लता भुजङ्ग पिङ्गलस् फुरत्फणा मणिप्रभा कदम्ब कुङ्कुमद्रवप् रलिप्तदिग्व धूमुखे |
मदान्ध सिन्धुरस् फुरत् त्वगुत्तरीयमे दुरे मनो विनोद मद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ||४||

सहस्र लोचनप्रभृत्य शेष लेखशेखर प्रसून धूलिधोरणी विधूस राङ्घ्रि पीठभूः |
भुजङ्ग राजमालया निबद्ध जाटजूटक श्रियै चिराय जायतां चकोर बन्धुशेखरः ||५||

ललाट चत्वरज्वलद् धनञ्जयस्फुलिङ्गभा निपीत पञ्चसायकं नमन्निलिम्प नायकम् |
सुधा मयूखले खया विराजमानशेखरं महाकपालिसम्पदे शिरोज टालमस्तु नः ||६||

कराल भाल पट्टिका धगद् धगद् धगज्ज्वल द्धनञ्जयाहुती कृतप्रचण्ड पञ्चसायके |
धरा धरेन्द्र नन्दिनी कुचाग्र चित्रपत्रक प्रकल्प नैक शिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम |||७||

नवीन मेघ मण्डली निरुद् धदुर् धरस्फुरत्- कुहू निशीथि नीतमः प्रबन्ध बद्ध कन्धरः |
निलिम्प निर्झरी धरस् तनोतु कृत्ति सिन्धुरः कला निधान बन्धुरः श्रियं जगद् धुरंधरः ||८||

प्रफुल्ल नीलपङ्कज प्रपञ्च कालिम प्रभा- वलम्बि कण्ठकन्दली रुचिप्रबद्ध कन्धरम् |
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छि दांध कच्छिदं तमंत कच्छिदं भजे ||९||

अखर्व सर्व मङ्गला कला कदंब मञ्जरी रस प्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम् |
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं गजान्त कान्ध कान्त कं तमन्त कान्त कं भजे ||१०||

जयत् वदभ्र विभ्रम भ्रमद् भुजङ्ग मश्वस – द्विनिर्ग मत् क्रमस्फुरत् कराल भाल हव्यवाट् |
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्डताण्डवः शिवः ||११||

स्पृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्- – गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः |
तृष्णारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समप्रवृत्तिकः ( समं प्रवर्तयन्मनः) कदा सदाशिवं भजे ||१२||

कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन् विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरः स्थमञ्जलिं वहन् |
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मंत्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ||१३||

इदम् हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसंततम् |
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिंतनम् ||१४||

पूजा वसान समये दशवक्त्र गीतं यः शंभु पूजन परं पठति प्रदोषे |
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्र तुरङ्ग युक्तां लक्ष्मीं सदैव सुमुखिं प्रददाति शंभुः ||१५||
इति श्रीरावण- कृतम् शिव- ताण्डव- स्तोत्रम् सम्पूर्णम्....

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Posted by prakash chand thapliyal

Friday, 4 March 2016

LORD RAM TEMPLE PROTEST (श्री राम मंदिर आंदोलन) by prakash chand thapliyal

मैं तो इश्क़ लिखने चला, इंक़लाब लिख गया, आई जंग की घड़ी है ,इसको स्वीकार लो !!

जिसकी कलम मे यार हो, पंक्ति मे जिसकी प्यार हो,उस कवि को आज सिरे से तुम नकार दो !!

चाहे हार हो या जीत हो ,देशभक्ति के ही गीत हो, परीक्षा अब निकट है इसको मान लो !!

चाहे छोटा हो या बड़ा, हिन्द के लिए खड़ा, देख के दुश्मन डरा ,संग्राम अब निकट है इसको जान लो !!

जब गौ का अपमान हो, श्री राम का उपहास हो, हिंदुत्व का परिहास हो ,जंग अब निकट है इसको स्वीकार लो !!













मैं अकेला चला, कारवाँ बन गया, वादा है ये भक्त का , सौदा है ये रक्त का, हथेली पे है लेके मस्तक चला !!
मुझको ऐसे वीर दो, दुश्मन का सीना चीर दो, मस्तको का झुण्ड हो, संग्राम अब प्रचंड हो !!

चारो और रामराज हो, केसरिया ही लिवास हो, पुण्य का अब काम हो, हर शिला पे राम हो, हिंदुत्व का उद्घोष हो इस हकीकत को तुम अब जान लो !!






हिन्द की कभी शाम न होने देंगे, वीरो की कुर्बानी कभी बर्बाद न होने देंगे, जब तक बची है एक बूंद भी लहू की हिंदुत्व को कभी बदनाम न होने देंगे !!

जब सारे वानर मिलकर सहस्त्र योजन समुद्र पर सेतु बांध सकते है तो हम तो मनुष्य है ,क्या हम श्रीराम जन्म भूमि पे राममंदिर का सपना साकार नही कर सकते क्या !!





















मैं तो अकेले ही जा रहा हू श्रीराम की सेवा मे फैसला आपके हाथ मे है आप हमारा साथ देते है या नही,

भविष्य मैं जल्द ही एक व्यापक आंदोलन होगा हिन्दू रक्षा समिति द्वारा ..


कृपया ज्यादा से ज्यादा संख्या मैं हमसे जुड़े.....
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Posted by prakash chand thapliyal

Thursday, 3 March 2016

ARTICLE 370 *(जानिए धारा 370 को)

#‎_उड़_जा_पंछी_ये_देश_पराया‬

आज आजाद भारत के अभिन्न हिस्से कश्मीर कुछ ऐसे कानून है जिनसे लगता ही नही की कश्मीर भारत का हिस्सा है!
जान गवाई देश के जवानो ने वीरता दिखलायी थी जिस माटी मे,
घुट रहा है दम तिरंगे का आज उस कश्मीर घाटी मे !
जिस कश्मीर की आजादी के लिए देश के जवानो ने जान गवाइ वो आज खुद गुलामी मे जी रहा है

जरा कश्मीर मे लगे कानूनों पर नज़र डालते है.....

1. जम्मू-कश्मीर के नागरिकों के पास दोहरी नागरिकता होती है ।
2. जम्मू-कश्मीर का राष्ट्रध्वज अलग होता है ।
3.जम्मू - कश्मीर की विधानसभा का कार्यकाल 6 वर्षों का होता है जबकी भारत के अन्य राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है ।
4.जम्मू-कश्मीर के अन्दर भारत के राष्ट्रध्वज या राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान अपराध नहीं होता है ।
5.भारत के उच्चतम न्यायलय के आदेश जम्मू - कश्मीर के अन्दर मान्य नहीं होते हैं ।
6.भारत की संसद को जम्मू - कश्मीर के सम्बन्ध में अत्यंत सीमित क्षेत्र में कानून बना सकती है ।
7.जम्मू कश्मीर की कोई महिला यदि भारत के किसी अन्य राज्य के व्यक्ति से विवाह कर ले तो उस महिला की नागरिकता समाप्त हो जायेगी । इसके विपरीत यदि वह पकिस्तान के किसी व्यक्ति से विवाह कर ले तो उसे भी जम्मू - कश्मीर की नागरिकता मिल जायेगी ।
8.धारा 370 की वजह से कश्मीर में RTI लागु नहीं है । RTE लागू नहीं है । 
CAG लागू नहीं होता । ...। 
भारत का कोई भी कानून लागु नहीं होता ।
9.कश्मीर में महिलावो पर शरियत कानून लागु है।
10.कश्मीर में पंचायत के अधिकार नहीं।
11.कश्मीर में चपरासी को 2500 ही मिलते है।
12.कश्मीर में अल्पसंख्यको [ हिन्दू- सिख ] को 16 % आरक्षण नहीं मिलता ।
13.धारा 370 की वजह से कश्मीर में बाहर के लोग जमीन नहीं खरीद सकते है।
14.धारा 370 की वजह से ही पाकिस्तानियो को भी भारतीय नागरीकता मिल जाता है । इसके लिए पाकिस्तानियो को केवल किसी कश्मीरी लड़की से शादी करनी होती है!
जिसकी शरहदो को हुर्रियत और अलगाववादियों ने घेरा ,
किस हक़ से केह दू कश्मीर तु है मेरा !
वीरो ने जान गवाकर भी कुछ नही पाया,
उड़ जा पंछी अब ये देश पराया !
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Posted by prakash chand thapliyal

Saturday, 27 February 2016

Message of prakash chand thapliyal on behalf of intolerance

कुछ बुद्धिजीवी ये कहते है कि उन्हें देशद्रोही कन्हैया कुमार से इसलिए हमदर्दी है क्योंकि वो बिहार का रहने वाला है....

उन सियासी बेवकूफो से एक सच्चे देशभक्त का सवाल ?
अगर बिहार का कोई व्यक्ति आपकी माँ य बहन की इज्जत पे हाथ डाले तो क्या तब भी आप उन से हमदर्दी रखोगे...

अब तो प्रशन माँ भारती का है  तो एक सच्चा देशभक्त कैसे चुप रहेगा...

"चीर दिया सीना वेदों का, घायल किया पुराणों को..!
बेच दिया वोटों की खातिर,संस्कृति के प्रतिमानों को..!!" .

"हरे रंग को खुश करने में, भगवा को नीलाम किया..!
अरे सियासी कलमूहों यह बहुत घिनौना काम किया..!!"

"तुमने काशी-पूरी-द्वारिका के ध्वज को दुत्कारा है..!
आजम और ओवेसी अब तक जिन्दा है ये अपराध तुम्हारा है..!!"

 "जिस रंग से पहचान हमारी धर्म सनातन जिंदा है..!
उसपर तुमने दाग लगाया हर हिन्दू शर्मिंदा है..!!"

"भगवा को आतंक बताने वालों मुझको लगता है..!
नस्ल तुम्हारी नकली है और खून तुम्हारा गन्दा है..!!

पुत्र मैं माँ भवानी का ...
मुझ पर किसका जोर ...
काट दूंगा हर वो सर ...
जो उठा मेरे धर्म की ओर ...
भुल जाओ अपनी जात ...
करो सिर्फ धर्म की बात ...
एकबार नही ...
सौ बार सही ...
हर बार यही दोहरायेगे ...
जहाँ जन्म हुआ ...
प्रभु श्री राम जी का ...
मंदिर वहीं बनायेंगे .

जय श्री राम!
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Posted by prakash chand thapliyal

Friday, 26 February 2016

Book of pain (दर्द की किताब)

जरा आराम से पलटना,
एक एक पन्ना,
इस किताब का,
यह एक दर्द की किताब है........
इस पूरी किताब में

इस किताब के हर एक पन्ने मे,
पन्ने के हर अनुच्छेद मे ,
अनुच्छेद की हर पंक्ति मे ,
पंक्ति के हर शब्द मे,
और हर शब्द के अर्थ मे,
दर्द ही दर्द है ,बेहिसाब दर्द है ,
यह एक दर्द की किताब है.........

न कसूर कलम का है ,
न स्याही का ,और न
मेरे अंदाज़ ए बयां का ,
ये तो दर्द ही था जो,
भीतर से निकलकर ,
कागज़ पर फैलता चला गया ,
फैलता चला गया, फैलता चला गया,
यह एक दर्द की किताब है........

यह दर्द है उन निश्चल नयनों का,
उन खिले लबों का ,उन चंचल बोलियों का,
उन करहाती चीखों का ,सिसकती साँसों का,
दर्द है उस कली का जो खिलने से पहले ही मसल दी गई,
नारी के अस्तित्व का ,स्त्री की गरिमा का,
जरा आहिस्ता से पलटना एक- एक पन्ना,
यह एक दर्द की किताब है ..........

दर्द उस गरीब का, उस सूखी रोटी का,
उस भूख से तड़पते बच्चे का, दर्द मासूमियत का,
दर्द खोते बचपन का ,इंसानियत की मौत का,
फुटपाथ पर सोते मजदूर का ,अमीर की अय्यासी का ,
गिरते हुए वतन का ,इंसानियत के पतन का,
जरा तस्सली से पलटना हर एक पन्ना
यह एक दर्द की किताब है.........

दर्द बोर्डर पे खड़े इंसान का,ऊपर से देख रहे भगवान का, विकते हुए इंसान का,झूठी शान का ,
दर्द आम आदमी का ,पाखंडी राजनेताओं का,
फैले हुए आक्रोश का ,समाज मे फैले अन्याय का ,
अगर जिगर हो तब ही आगे पलटना,
यह एक दर्द की किताब है........

दर्द ‪#‎रामराज‬ के नाश का ,विदेशी संस्कृति के राज का ,
हिन्द के परिहास का,हिंदुत्व के नाश का ,
गऊ के अपमान का ,माँ के स्वाभिमान का ,
गिरती हुई संस्कृति का ,जलती हुई प्रकृति का,
सोती हुई सरकार का ,विखरे समाज का,
आतंकियो के राज का ,देश के विनाश का,
दर्द ही दर्द है ,यहां से वहां तक ,
यह एक दर्द की किताब है.......

मेरे दिल को चीरती है यह एक वेदना,
कहाँ गयी मेरे देश के लोगों की संवेदना !
मेरा देश तो ऐसा देश था भाई लाखों बार मुसीबत आई,
सबने मिलकर करी लड़ाई पर देश की लाज बचाई !!
यह बात जरूर याद रखना.....
आज भी भारत में वृन्दावन मे श्री कृष्ण रास करते ,
हर स्त्री मे सीता और पुरुष मे श्री राम वास करते है!

मै अपने सारे सौ करोड़ हिन्दू भाइयों का आवाहन करता हूँ आओ
मिलकर देश का फिर से निर्माण करते है .....
कृपया भारी से भारी संख्या में हमसे जुड़े
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Posted by prakash chand thapliyal

Saturday, 20 February 2016

दर्द शहीदों का (pain of martyrs)

पूछ रहा है सवाल भगत सिंह, राजगुरु और हर एक शहीद जावान!
क्या इसी आजादी के लिए दिया था हमने बलिदान!!

जिस तिरंगे की आन के लिए ,खुशी खुशी दी थी वीरो ने अपनी जान!
आज आजाद हिन्दुस्तान मे खतरे मे पड गयी है हमारे तिरंगे की शान!!

जिस सीने ने देश की शरहद पे ,प्रतिकूल हालातो मे प्रहार झेले है!
आज इन देशद्रोहियो के हितैषियों की वजह से ,हुए वो अकेले है!!

आज राजनीति कितनी गंदी हो गयी है ,
किस प्रकार देशद्रोह पर भी राजनीति की जाती है और आतंकियों को किस प्रकार प्रोत्साहित किया जा रहा है,
उसका थोड़ा वर्णन.....

बड़े-बड़े जब मेमन की फांसी रुकवाने अड़ते हैं,
दृश्य देख ये आतंकी के और हौसले बढ़ते हैं!

जब अफजल और हाफिज सईद के पीछे साहब जोड़ा जाता है,
ऐसा करके वीरो और सेनाओं का साहस तोड़ा जाता है!

डायन, भारत माँ को कहकर जो मंत्री बन जाता है,
देख के उनको आतंकी का फिर से सीना  तन जाता है!

जब अफरीदी के छक्कों पर ताली बजने लगती है,
आतंकी मंसूबों की उम्मीदे फिर से जगने लगती है!

काश्मीर में जब भारत का झंडा जलने लगता है,
ठीक उसी पल आतंकियों का सपना पलने लगता है!

ऐसे मुद्दों पर भी संसद राजनीति कर जाती है,
आतंकी हँसते हैं ,सेनिको की चीखें मर जाती है!

कठिन वक्त में प्यारे सब को एक साथ बढ़ना होगा,
राष्ट्रवाद की खातिर सब को एक साथ लड़ना होगा!

निहित स्वार्थ से ऊपर उठकर राष्ट्रवाद की बात करो,
आलोक तिरंगे के चेहरे पर खुशियों की बरसात करो!

एक बार फिर ये पंक्तिया दोहराने की जरूरत है....

भरा नही जो भावो से,
बहती जिसमे रसधार नही!
हृदय नही वो पत्थर है ,
जिसमे स्वदेश का प्यार नही!!

सभी देशभको को एक संदेश .....
कृपया एक हो जाओ और देश द्रोहियो को मिल कर देश से निकालो !!
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Posted by prakash chand thapliyal

Friday, 19 February 2016

राष्ट्र के नाम एक संदेश

आज कुछ बातें दिल से निकलेगी,
उम्मीद है दिल तक पहुँचेगी...

आज जिंदगी की इस भाग दौड़ मे हमे न जाने कहाँ जाने की जल्दी है इस भाग दौड़ मे हम इतना आगे निकल आये है कि पीछे मुड़ कर देखना जरा मुश्किल लगता है...

चलो एक नजर डालते है कि हम कितना आगे निकल आये है......

अपनी खुशी तो याद रही पर दुसरो के गम को भूल गए,
निज हित तो याद रहा पर देश धर्म को भूल गए|
राजनीति तो याद रही पर राम नीति की भूल गए,
जीवन जीना सीख गए पर अर्थ उसका भूल गए||

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flirting करना याद रहा पर प्यार निभाना भूल गए,
girlfriend का हाथ साथ रहा और माँ के पैरो को भूल गए|
Divorce लेना सीख गए और रिश्ते निभाना भूल गए,
जीवन जीना सीख गए पर मूल्य उसका भूल गए||

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अंग्रेजी तो हम सीख गए पर हिन्दी लिखना भूल गए,
चाउमीन पिज़्ज़ा खाना याद रहा चूल्हे की रोटी भूल गए|
हाय हैल्लो तो सीख गए पर राम राम करना भूल गए,
मॉडर्न तो हम हो गए पर संस्कार दूर कही पर भूल गए||

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jeans पहनना सीख गए और साड़ी कुर्ता भूल गए,
attitude तो सीख लिया पर संस्कार दूर कही पर भूल गए|
खिलोनो से खेलना भूल गए और जज्बातों से खेलना सीख गए,
जीवन जीना सिख गए पर उद्देश्य उसका भूल गए||

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सत्ता सुख तो याद रहा और राम लला को भूल गए,
जिस वादे से सत्ता मे आये उसी वादे को भूल गए|
आज देश मे जिंदा लाशे कर रही है राज ,
इसीलिए राम मंदिर चंद कानूनी फाइलो का है महोताज||

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अनुष्का शर्मा याद रही और क्रिकेट खेलना भूल गए,
अपना गौरव याद रहा पर शोर्य देश का भूल गए|
रासलीला तो सीख गए पर सार गीता का भूल गए,
जीवन जीना सीख गए पर लक्ष्य उसका भूल गए||

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यू तो ये हवा का झोंका भी नही पर समझते है खुद को आंधी,
इन जनाब का नाम है श्रीमान राहुल गांधी|
अलगाववादियों से मिलना इन्हें जरूरी लगा और देश के लिए गोली खाने वालो को भूल गए,
राजनीति तो ये कभी सीख नही पाए अब राष्ट्रनीति भी भूल गए।।

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आजकल कुछ ज्यादा ही modern हो गए युवा कहते है "we dont like religious topic like hinduism"..

वे कृपया ध्यान से पढ़े....

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हिंदू न ही सिर्फ एक धर्म है जबकि ये तो एक पूरी सभ्यता है,
भारत मैं रहने वाला हर एक नागरिक हिन्दू है|
जब जब देश मैं हिन्दू यू ही सोता है,
देश हमारा अक्सर यू ही रोता है||

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अगर किसी को अपने आप को हिन्दू कहने से है परेशानी ,
तो वो नही है असली हिन्दुस्तानी|
अब और देशद्रोही नही बर्दाश करेगा हिन्दुस्तान ,
उन सबकी मेजबानी करेगा हमारा पड़ोसी पाकिस्तान||

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अगर कभी हो जाये कभी इतनी औकात किसी अमीर की,
तो लगा के दिखाए कीमत हमारे ज़मीर की|
हमारी जरूरते है कम इसलिए हमारे जमीर मे है दम,
बस एक बात का है गम आपका साथ है थोड़ा कम||

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आप सभी से निवेदन है ज्यादा से ज्यादा संख्या मे हमसे जुड़े......

अगर ये सब बातें आपको कही और मिल जाये तो हम ये मुहिम छोड़ देंगे,
क्योंकि हम यहा झूठ बोलने या नकल करने नही आये है|

हम राजनीति नही राम नीति करने आये है|..
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Posted by prakash chand thapliyal